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Ravidas ji ki katha, रविदासजी की कथा (story of Ravidas ji)


रविदास जी की कथा story of ravidass ji

रविदास जी कबीर साहिब जी के परम् शिष्य थे वे कबीर साहेब जी के साथ रहा करते थे । एक दिन की बात है उसी गांव का एक ब्राह्मण रविदास जी को आकर बताता है कि चलो रविदास जी आज गंगा स्नान करके आते हैं । रविदास जी ने कहा कि हम गंगा स्नान नहीं जाते हैं हम तो यही राम नाम की  गंगा से स्नान कर लेते हैं हम नहीं जाते  । 
 रविदास जी ने ब्राह्मण के साथ जाने  के लिए हां नहीं की तो ब्राह्मण ने कहा की ठीक है आप मत जाइए  अगर आपको गंगा मैया को कुछ देना है तो रुपए , दो रुपया दे दो मैं वहां दान कर दूंगा । रविदास जी ने कहा की पंडित जी एक काम करो मैं 1 रुपया देता हूं और इस एक रुपये को गंगा मां को तब देना जब वह मेरा रुपया स्वयं हाथ से ले  । 

उसके बाद ब्राह्मण ने एक रुपया लेकर  गंगा स्नान के लिए निकल गया ।  गंगा किनारे पानी में खड़ा रहकर कहता है  की गंगा मैया रविदास जी ने आपके लिए एक रुपया भेजा है ।
इस पर गंगा  ने प्रकट होकर एक हाथ से  रुपैया लिया और दूसरे हाथ से एक सुंदर सफेद चांदी का कंगन दिया ओरकही  कि भगवान के प्रिय भक्त रविदास जी को यह कंगन दे देना ।

ब्राह्मण ने वह कंगन लेकर वापस गांव आया और सोचा कि यह कंगन रविदास जी को देंगे तो  रविदास जी मुझे क्या देंगे ! अगर मैं यह कंगन है राजा को देता हूं तो राजा मेरे को बहुत धन देगा और मैं धनवान हो जाऊंगा ।
ब्राह्मण में वह कंगन राजा को दे दिया और राजा ने यही करना अपने रानी को दे दिया । कंगन बहुत ही सुंदर अनमोल और सुंदर लगा ।  रानी ने सोचा कि एक कंगन और मंगवा लूं तो एक जोड़ा हो जाएगा दोनों हाथों में पहनने के लिए । रानी ने जब राजा को बताया कि  एक कंगन  और मंगाये । राजा ने वापस ब्राह्मण को बुलाया और कहा कि ब्राह्मण ऐसा एक कंगन और लेकर आओ । ब्राह्मण ने कहा कि महाराज कंगन एक ही है अब  दूसरा कंगन नही है । राजा ने कहा कि किसी भी हालत में एक कंगन और चाहिए नहीं तो आप को फांसी पर लटका दिया जाएगा । 

ब्राह्मण बहुत घबराया और घर आ गया , केवल सूली दिखाई देने लगी । खाना पीना सब छोड़ दिया।

  ब्राह्मण की पत्नी को पता चला  तो उनकी पत्नी ने कहा कि आप रविदास जी के पास जाइए और उनसे प्रार्थना कीजिए  तभी इसका समाधान होगा। 

 ब्राह्मण  रविदास जी के पास जाकर चरणों मे रोने लगे , तब रविदासजी जी ने रोने का कारण पूछा ।  ब्राह्मण ने सब कुछ सही सही बता दिया ।  

रविदास जी चमड़े की जूतियां बनाते थे जो जानवर मर जाते तो उनकी खाल निकालकर फिर उनसे  जूतियां बनाते थे ।

रविदासजी जहां पर बैठकर चमड़े का काम करते थे वहां पर एक कुंडी होती थी जिसमें पानी होता था जो चमड़े को भिगो भिगो कर एक एक धागे से जूतियां बनाते थे ।

रविदास जी ने कहा कि पंडित जी इस कुंडी  में हाथ देकर जितने आपको कंगन चाहिए आप निकालकर ले जाइए ।  ब्राह्मण को उस समय फांसी दिखाई दे रही थी मजबूरी के कारण  चमड़े को भिगोने की कुंडी में  फटाफट हाथ डाले  तो 3,4 कंगन हाथ मे आ गए। ब्राह्मण ने एक कंगन निकाला तथा रविदासजी की को प्रणाम करके राजा के पास पहुंच गया । राजा ने उसकी जान बख्शी ।

   रानी को यह पता चला तो सोचा कि ब्राह्मण इतने सुंदर कंगन  कहां से लाता है जरूर जांच करनी चाहिए । 

जब रानी ने  इस कंगन की सच्चाई जानी तो  रानी ने रविदास जी को गुरु बना लिया और उनके द्वारा बताई विधि से  भगवान की भक्ति करने लगी ।

कुछ समय बाद रानी ने एक धर्म भंडारा किया जिसमें रविदास जी को आमंत्रित किया गया ।
इसमें 700  ब्राह्मणों को भी न्योता दिया गया । भंडारा शुरू हुआ और सभी को भंडारा परोसने लगे तथा एक आसन लगाकर रविदास जी को बिठाया गया । 


यह बात ब्राह्मणों को अच्छी नहीं लगी तो सभी ब्राह्मण कहने लगे रानी आपने हमारा अपमान किया है नीच जाति का व्यक्ति हमारे  से ऊपर आसन पर बैठा है ।

 रानी कुछ बोले इससे पहले रविदासजी जी कहने लगे कि ब्राह्मणों मेरी गलती हो गई कि मैं यहां बैठ गया ,  मेरी जगह तो आपसे चरणों में होनी चाहिए । 

रविदास जी ने अपनी शिष्य रानी को समझाया कि कोई बात नहीं है बेटी घर पर आए ब्राह्मणों का अपमान नहीं करना है और यह मेरा आदेश भी है मैं नीचे ही बैठूंगा जहां पर ब्राह्मणों ने चप्पल जूते खोली है ।

 रानी ने गुरु जी की आज्ञा मानना ही सर्वश्रेष्ठ समझा ।  जब रविदास जी थोड़ी दूर बैठकर खाना खाने लगे तब सभी   700 ब्राह्मणों की थाली में रविदास जी 700 रूप बनाकर भंडारा कर रहे हैं । यह देखकर सारे ब्राह्मण उछल कूद करने लगे ।

भंडारा करके रविदास प्रवचन करने लगे  कि गले मे जनेऊ डालने से ब्राह्मण या भक्त नही बन जाते ।  भगवान की सही भक्क्ति ही उसका जनेऊ होती है। 

रविदास जी के पास एक चमड़ा काटने की छुरी थी  , उस छुरी से रविदासजी जी ने अपना शरीर काटकर दिखाया तो एक सोने का जनेऊ दिखाई दिया।  

सभी ब्राह्मण यह चमत्कार देखकर रविदास जी के चरणों में गिर गए और अपने जनेऊ को काट के रविदास जी के चरणों में डाल दिया।
 
 सभी श्रोताओं व 700 ब्राह्मणों ने रविदास जी से नाम दीक्षा ली तथा अपना कल्याण करवाया ।

ऐसे होते हैं सतभक्ति करने वाले भक्त होते हैं । 
 भक्तो की कोई जात पात नही होती। 


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1 टिप्पणियाँ

बेनामी ने कहा…
Good story